राजधानी की सड़कों और गलियों में मुस्तैद दिल्ली की तीसरी आंख अब अपना चश्मा बदलने जा रही है। अब तक शहर की सुरक्षा का जिम्मा संभाल रहे लाखों कैमरों में से चीनी तकनीक के साये को पूरी तरह हटाने की तैयारी कर ली गई है। दिल्ली सरकार ने फैसला किया है अव्यवस्थित तरीके से लगे सीसीटीवी कैमरों को व्यवस्थित तरीके से लगाने के साथ ही पुराने हो चुके चीनी कैमरों को बदलकर अत्याधुनिक कैमरे लगाए जाएं। इन कैमरों को प्राथमिकता के आधार पर हॉटस्पाॅट वाली जगहों पर स्थापित किया जाएगा।
राजधानी में 2018 से अब तक दो चरणों में लगभग 2.8 लाख कैमरे लगाए गए। इनमें से पहले चरण में लगाए गए अधिकांश कैमरे चीनी कंपनियों के हैं और सिम-आधारित तकनीक पर काम करते हैं। विशेषज्ञों ने इन कैमरों के जरिए डेटा लीक होने और राष्ट्रीय सुरक्षा पर संभावित खतरे की आशंका जताई थी। सरकार का मानना है कि तकनीकी रूप से आउटडेटेड हो चुके हैं, इसलिए इन्हें चरणबद्ध तरीके से हटाकर आधुनिक कैमरों में बदला जाएगा। अब तक सीसीटीवी का मुख्य उपयोग अपराध होने के बाद सबूत जुटाने के लिए किया जाता था। लेकिन नई योजना के तहत, सरकार का ध्यान अपराध रोकथाम पर है। इसके लिए सरकार एक विशेषज्ञ सलाहकार नियुक्त करेगी जो पूरे नेटवर्क का अध्ययन करेगा। ऑडिट में यह देखा जाएगा कि किन इलाकों में कैमरों की अधिकता है और कहां डार्कस्पॉट बचे हैं। कैमरों के एंगल इस तरह तय होंगे कि अपराधियों की पहचान आसान हो और डेटा सीधे पुलिस के साथ साझा किया जा सके।
एकीकृत निगरानी तंत्र किया जाएगा विकसित
ऑडिट में यह बात भी सामने आई है कि दिल्ली के कई प्रमुख बाजारों और चौराहों पर अलग-अलग एजेंसियों (जैसे दिल्ली पुलिस, नगर निगम और पीडब्ल्यूडी) ने अपने-अपने कैमरे लगाए हुए हैं। एक ही खंभे पर तीन-चार कैमरे होने से न केवल बिजली की खपत बढ़ती है, बल्कि डेटा प्रबंधन में भी भारी भ्रम पैदा होता है। नई नीति के तहत इस डुप्लीकेशन को खत्म कर एक एकीकृत निगरानी तंत्र विकसित किया जाएगा, ताकि सरकारी पैसे और संसाधनों की बचत हो सके। वर्तमान में इस विशाल नेटवर्क का रखरखाव केंद्र सरकार की संस्था भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। कैमरों की फुटेज 30 दिनों तक सुरक्षित रखी जाती है, जिसे जरूरत पड़ने पर पुलिस या अदालत को सौंपा जाता है। नई योजना में सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में कैमरों का समान वितरण और बेहतर कनेक्टिविटी सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा गया है।
इसलिए कैमरों को बदलने की है जरूरत
- डेटा सुरक्षा : चीनी कैमरों और सिम-आधारित तकनीक से जासूसी और डेटा चोरी का खतरा।
- तकनीकी सीमा : पुराने कैमरों में रात के समय विजिबिलिटी और चेहरा स्पष्ट दिखने में समस्या।
- असमान वितरण : कुछ रिहायशी कॉलोनियों में जरूरत से ज्यादा कैमरे, जबकि अपराध वाले हॉटस्पॉट्स अभी भी खाली।
- खराब स्थिति : पहले चरण (2018) में लगे कैमरों का मेंटेनेंस अब महंगा पड़ रहा है और वे बार-बार खराब हो रहे हैं।
नई व्यवस्था के तहत यह कदम उठाए जाएंगे…
- स्मार्ट कमांड सेंटर : पूरी दिल्ली की लाइव मॉनिटरिंग के लिए एक सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल रूम, जहां आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का उपयोग होगा।
- रियल-टाइम अलर्ट : संदिग्ध गतिविधि या लावारिस वस्तु दिखने पर कैमरा खुद कंट्रोल रूम को अलर्ट भेजेगा।
- एकीकृत डेटा शेयरिंग : पुलिस और अन्य सुरक्षा एजेंसियों को फुटेज के लिए लंबी कागजी कार्रवाई के बजाय रियल-टाइम डिजिटल एक्सेस मिलेगा।
यह बदलाव सिर्फ कैमरों को बदलना नहीं, बल्कि दिल्ली की डिजिटल सुरक्षा को स्वदेशी अभेद्य कवच पहनाना है, जहां डेटा की गोपनीयता और नागरिक सुरक्षा के साथ कोई समझौता नहीं होगा।
-प्रवेश साहिब सिंह, पीडब्ल्यूडी मंत्री
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