• विकास कार्यों से ज्यादा ‘दखलअंदाजी’ की चर्चा, स्टाफ में आक्रोश
• फाइलों से लेकर अधिकारियों के कक्ष तक दखल, मर्यादा की सीमा लांघने के आरोप
• शिकायतों के बावजूद कार्रवाई शून्य, निगम प्रशासन की चुप्पी पर उठे सवाल
गाजियाबाद। नगर निगम के दफ्तरों में इन दिनों विकास योजनाओं, सफाई अभियान या निर्माण कार्यों से ज्यादा चर्चा एक ‘कैमरामैन’ की कार्यशैली को लेकर हो रही है। आधिकारिक तौर पर जिसकी जिम्मेदारी केवल निगम की गतिविधियों की फोटोग्राफी कवरेज तक सीमित है, वह इन दिनों कथित रूप से प्रशासनिक कामकाज में दखल देकर खुद को एक समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करने की कोशिश करता नजर आ रहा है। सूत्रों के अनुसार, यह शख्स अक्सर अपने निर्धारित कार्यक्षेत्र से बाहर जाकर विभिन्न विभागों में अनावश्यक हस्तक्षेप करता है। अधिकारियों के कक्षों में बिना पूर्व अनुमति प्रवेश, पटल सहायकों के कामकाज में टोकाटाकी और फाइलों की प्रगति पर टिप्पणी करना उसकी रोजमर्रा की गतिविधियों में शामिल बताया जा रहा है। निगम कर्मचारियों का कहना है कि इससे न केवल कार्य की गति प्रभावित हो रही है, बल्कि कार्यसंस्कृति पर भी नकारात्मक असर पड़ रहा है। कर्मचारियों के बीच यह चर्चा आम है कि उक्त ‘कैमरामैन’ को कुछ प्रभावशाली अधिकारियों और जनप्रतिनिधियों का संरक्षण प्राप्त है।
इसी कथित वरदहस्त के चलते वह बार-बार चेतावनी मिलने के बावजूद अपने व्यवहार में बदलाव नहीं ला रहा। कई वरिष्ठ अधिकारियों ने अनौपचारिक तौर पर उसे फटकार लगाई और अपनी सीमा में रहने की नसीहत भी दी, लेकिन बताया जाता है कि इन चेतावनियों का उस पर कोई खास असर नहीं पड़ा। निगम के एक कर्मचारी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि यह शख्स अक्सर गोपनीय बैठकों और विभागीय चर्चाओं के आसपास मौजूद रहता है। कर्मचारियों को आशंका है कि अंदरूनी सूचनाओं में उसकी अनावश्यक रुचि प्रशासनिक गोपनीयता के लिए खतरा बन सकती है। कई बार तो स्थिति इतनी असहज हो जाती है कि कर्मचारी अपने ही दफ्तर में असुरक्षित और दबाव में काम करने को मजबूर हो जाते हैं।
मामले की गंभीरता इस बात से भी समझी जा सकती है कि अब तक कई मौखिक और लिखित शिकायतें उच्चाधिकारियों तक पहुंच चुकी हैं। बावजूद इसके कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई सामने नहीं आई है। इससे निगम प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल उठने लगे हैं। क्या वाकई एक कर्मचारी के खिलाफ कार्रवाई करने में सिस्टम असहाय है? या फिर राजनीतिक और प्रशासनिक दबाव के चलते मामले को ठंडे बस्ते में डाला जा रहा है?
निगम की कार्यप्रणाली से जुड़े जानकारों का कहना है कि किसी भी संस्थान में अनुशासन और अधिकार-सीमा का स्पष्ट निर्धारण बेहद आवश्यक होता है।
यदि कोई कर्मचारी अपनी जिम्मेदारियों से आगे बढ़कर दूसरे विभागों के कार्य में हस्तक्षेप करता है, तो इससे न केवल कार्यकुशलता प्रभावित होती है, बल्कि अन्य कर्मचारियों का मनोबल भी गिरता है। वर्तमान परिदृश्य में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर यह ‘कैमरामैन’ किसके संरक्षण में इतना बेखौफ होकर काम कर रहा है? यदि वास्तव में उसे किसी प्रभावशाली जनप्रतिनिधि या अधिकारी का समर्थन प्राप्त है, तो यह स्थिति और भी चिंताजनक है। क्योंकि तब यह केवल एक कर्मचारी का मामला नहीं रह जाता, बल्कि पूरे प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न बन जाता है। निगम के भीतर यह भी चर्चा है कि यदि समय रहते इस प्रवृत्ति पर रोक नहीं लगाई गई, तो अन्य कर्मचारी भी अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर दखल देने की कोशिश कर सकते हैं, जिससे अराजकता का माहौल बनना तय है।
प्रशासनिक व्यवस्था में संतुलन और अनुशासन बनाए रखना सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। नगर निगम प्रशासन के सामने अब दो रास्ते हैं-या तो वह स्पष्ट जांच कर आरोपों की सच्चाई सामने लाए और दोषी पाए जाने पर कठोर कार्रवाई करे, या फिर चुप्पी साधकर इस समानांतर सत्ता को और मजबूत होने दे। फिलहाल निगम के गलियारों में एक ही सवाल गूंज रहा है-क्या एक ‘कैमरामैन’ की मनमानी पर लगाम लगेगी, या फिर शिकायतों का ढेर यूं ही फाइलों में दबा रह जाएगा? आने वाले दिनों में प्रशासन की कार्रवाई ही यह तय करेगी कि निगम की कार्यसंस्कृति पारदर्शिता और अनुशासन की राह पर आगे बढ़ेगी या रसूख और दखलंदाजी की भेंट चढ़ती रहेगी।
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