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होमताजा खबरदेशदिल्ली में ममता की तन्हा मौजूदगी, तृणमूल कांग्रेस के खात्मे का संकेत तो नहीं!

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Mamata Banerjee Lonely Delhi Visit Story: टीएमसी सुप्रीमो ममता बनर्जी इस वक्त अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही हैं. सोमवार का उनका दिल्ली दौरा संभवतः उनका सबसे बुरा दिल्ली दौरा था. इस दिल्ली दौरे में ममता बनर्जी बिल्कुल अकेले दिखीं. कभी पार्टी सांसदों और नेताओं घिरीं रहने वाली ममता सोमवार को बिल्कुल अकेली दिखीं. उनके साथ केवल उनके भतीजे और डेरेक ओ’ब्रायन ही साथ थे.

दिल्ली में ममता की तन्हा मौजूदगी, तृणमूल कांग्रेस के खात्मे का संकेत तो नहीं!Zoom

ममता बनर्जी सोमवार को इंडिया गठबंधन की बैठक में शामिल होने दिल्ली पहुंची थीं. फोटो- पीटीआई

Mamata Banerjee Lonely Delhi Visit Story: राजनीति में कभी-कभी सन्नाटा भी बहुत कुछ कह जाता है. दिल्ली में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) प्रमुख ममता बनर्जी की हालिया यात्रा के दौरान दिखाई दिया यही सन्नाटा अब पार्टी के भीतर गहराते संकट की ओर इशारा कर रहा है. जो दिल्ली कभी ममता के समर्थक सांसदों और नेताओं की भीड़ से गुलजार रहती थी, वहां इस बार उनके साथ केवल कुछ चुनिंदा चेहरे ही दिखाई दिए. यह बदलाव महज संयोग नहीं, बल्कि पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी और असंतोष का संकेत माना जा रहा है.

एक समय था जब दिल्ली में ममता बनर्जी की मौजूदगी का मतलब होता था कि टीएमसी सांसदों और नेताओं का पूरा जत्था उनके आसपास दिखाई दे. पार्टी सांसद उनके साथ बैठकों में शामिल होने और सार्वजनिक रूप से समर्थन जताने को उत्सुक रहते थे. लेकिन इस बार तस्वीर अलग थी. पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव अभिषेक बनर्जी और राज्यसभा सांसद डेरेक ओ’ब्रायन के अलावा शायद ही कोई बड़ा चेहरा उनके साथ नजर आया. अभिषेक अपनी बुआ यानी ममता दीदी के दिल्ली दौरे से दो दिन पहले ही दिल्ली आ गए थे. उन्होंने यहां तमाम सांसदों से संपर्क करने की कोशिश थी. चीजों को व्यवस्थित करने की कोशिश की लेकिन अधिकतर सांसदों को फोन बंद मिले, किसी ने कोई रिटर्न कॉल नहीं किया.

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब वरिष्ठ सांसद काकोली घोष दस्तिदार ने दावा किया कि करीब 20 टीएमसी सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए का समर्थन करने की इच्छा जताई है. उन्होंने पार्टी के भीतर एक विद्रोही गुट के गठन की भी घोषणा की. हालांकि इस दावे की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है, लेकिन इसने राजनीतिक हलकों में हलचल जरूर बढ़ा दी है.

कई सांसदों का दिल्ली से दूरी बनाना भी चर्चा का विषय बन गया

दिलचस्प बात यह है कि कई सांसदों का दिल्ली से दूरी बनाना भी चर्चा का विषय बन गया. खासकर महिला सांसदों का ममता की यात्रा के दौरान सार्वजनिक रूप से सामने न आना राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है. भारतीय राजनीति में नेताओं के साथ खड़े होने या दूरी बनाने का प्रतीकात्मक महत्व होता है और इस बार यह दूरी काफी स्पष्ट दिखाई दी.

ममता बनर्जी की स्थिति की तुलना कुछ लोग कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी से कर रहे हैं. 1990 के दशक के अंतिम वर्षों में जब सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली थी तब पार्टी भी आंतरिक संकट, टूट और नेतृत्व की चुनौतियों से जूझ रही थी. लेकिन कांग्रेस का राष्ट्रीय ढांचा और संगठनात्मक ताकत उसके पुनर्निर्माण में मददगार साबित हुए. सोनिया गांधी ने वफादार नेताओं के सहारे पार्टी को फिर खड़ा किया और बाद में यूपीए सरकार का गठन संभव हुआ.

लेकिन ममता बनर्जी के सामने परिस्थितियां अलग हैं. टीएमसी की ताकत मुख्य रूप से पश्चिम बंगाल तक सीमित है. राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी की मौजूदगी बेहद सीमित है और संगठनात्मक आधार भी कांग्रेस जितना व्यापक नहीं है. ऐसे में पार्टी के भीतर पैदा होने वाली दरारें कहीं अधिक स्पष्ट और खतरनाक साबित हो सकती हैं.

इसके अलावा भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी पार्टी की मुश्किलें बढ़ा दी हैं. शिक्षक भर्ती घोटाला, कोयला तस्करी और अन्य मामलों में कई टीएमसी नेताओं के नाम सामने आए हैं. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कुछ सांसदों को आशंका है कि कानूनी और राजनीतिक चुनौतियों के समय पार्टी नेतृत्व उनकी पर्याप्त सुरक्षा नहीं कर पाएगा. यही वजह है कि कई नेता अपने राजनीतिक भविष्य के विकल्प तलाशते दिखाई दे रहे हैं.

दिल्ली में अभिषेक बनर्जी के आवास और पूर्व सांसद सुखेंदु शेखर रॉय के निवास के आसपास पसरा सन्नाटा भी इसी बदलते राजनीतिक माहौल का प्रतीक बन गया है. कभी जो स्थान टीएमसी सांसदों के अनौपचारिक शक्ति केंद्र माने जाते थे, वहां अब गतिविधियां बेहद सीमित हो गई हैं.

हालांकि, ममता बनर्जी अभी भी पश्चिम बंगाल में एक मजबूत जननेता हैं और उनको कमतर आंकना जल्दबाजी होगी. लेकिन दिल्ली यात्रा ने यह जरूर दिखा दिया कि पार्टी के भीतर असंतोष अब फुसफुसाहटों तक सीमित नहीं रहा. फिलहाल, ममता बनर्जी के आसपास का सन्नाटा ही सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश बनकर उभरा है. कभी अटूट मानी जाने वाली निष्ठा की जगह अब सवालों ने ले ली है और यही टीएमसी नेतृत्व के लिए सबसे गंभीर चेतावनी है.

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संतोष कुमार

न्यूज18 हिंदी में बतौर एसोसिएट एडिटर कार्यरत. मीडिया में करीब दो दशक का अनुभव. दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, आईएएनएस, बीबीसी, अमर उजाला, जी समूह सहित कई अन्य संस्थानों में कार्य करने का मौका मिला. माखनलाल यूनिवर्स…और पढ़ें

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