-निर्माण सामग्री और मजदूरी में भारी बढ़ोतरी से भवन निर्माण क्षेत्र गहरे संकट में
-ट्रांस हिंडन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष संदीप शुक्ला बोले- बाजार में मांग घटी, बिल्डर और खरीदार दोनों परेशान
-दिल्ली-एनसीआर में लाखों आवासीय परियोजनाएं प्रभावित, सरकार से राहत पैकेज और सस्ती ब्याज दरों की मांग
उदय भूमि संवाददाता
गाजियाबाद। देशभर में लगातार बढ़ती महंगाई अब आम आदमी के आशियाने के सपने पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है। चुनावी माहौल समाप्त होने के बाद से निर्माण सामग्री, परिवहन और श्रमिकों की मजदूरी में आई तेज बढ़ोतरी ने भवन निर्माण क्षेत्र की रफ्तार को धीमा कर दिया है। मकान बनवाना हो या नया फ्लैट खरीदना, हर स्तर पर लागत तेजी से बढ़ रही है, जिससे बिल्डर, निवेशक और आम खरीदार सभी आर्थिक दबाव महसूस कर रहे हैं। राजधानी दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र में इसका असर सबसे अधिक दिखाई दे रहा है, जहां कई निर्माण परियोजनाएं लागत बढऩे के कारण धीमी पड़ गई हैं। इस पूरे मुद्दे पर संदीप शुक्ला ने चिंता जताते हुए कहा कि वर्तमान समय में भवन निर्माण क्षेत्र अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रहा है। लगातार बढ़ती निर्माण लागत और घटती खरीद क्षमता ने बाजार की स्थिति को बेहद चुनौतीपूर्ण बना दिया है। उन्होंने कहा कि मांग और आपूर्ति के बीच बड़ा अंतर पैदा हो चुका है, जिससे रियल एस्टेट कारोबार पर सीधा असर पड़ रहा है। संदीप शुक्ला ने बताया कि पिछले एक वर्ष के दौरान निर्माण सामग्री की कीमतों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। पहले जहां सीमेंट की एक बोरी लगभग 400 रुपये में मिल जाती थी, वहीं अब इसकी कीमत 450 रुपये से अधिक पहुंच चुकी है। इसी प्रकार सरिया की कीमत भी 65 हजार रुपये प्रति टन से बढ़कर 78 हजार रुपये प्रति टन के पार पहुंच गई है।
उन्होंने कहा कि डीजल के दाम बढऩे का असर परिवहन व्यवस्था पर भी पड़ा है, जिससे रेत, गिट्टी और ईंट जैसी सामग्री की ढुलाई करीब 25 प्रतिशत तक महंगी हो गई है। उन्होंने कहा कि निर्माण लागत में बढ़ोतरी का सबसे बड़ा असर बिल्डरों पर पड़ रहा है। परियोजनाओं की लागत लगातार बढ़ने से कई बिल्डर आर्थिक दबाव में आ गए हैं। यदि वे मकानों और फ्लैटों की कीमत बढ़ाते हैं तो खरीदार पीछे हट जाते हैं और यदि कीमत स्थिर रखते हैं तो परियोजना की लागत और बैंक ऋण का बोझ बढ़ता चला जाता है। ऐसी स्थिति में छोटे और मध्यम स्तर के बिल्डर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
ट्रांस हिंडन वेलफेयर एसोसिएशन के अध्यक्ष संदीप शुक्ला ने कहा कि श्रमिकों की मजदूरी में भी तेजी से इजाफा हुआ है। पहले जो कारीगर 500 रुपये प्रतिदिन में काम करता था, वह अब 650 रुपये या उससे अधिक मजदूरी की मांग कर रहा है। इससे निर्माण कार्यों की कुल लागत और अधिक बढ़ गई है। उन्होंने कहा कि मजदूरी और सामग्री दोनों महंगी होने से नई परियोजनाओं को समय पर पूरा करना भी चुनौती बनता जा रहा है।
दिल्ली-एनसीआर की स्थिति पर चिंता जताते हुए संदीप शुक्ला ने कहा कि एक अनुमान के अनुसार इस क्षेत्र में करीब 1.9 लाख आवासीय इकाइयां अभी भी देरी का सामना कर रही हैं। कई परियोजनाएं समय पर पूरी नहीं हो पा रही हैं, जिससे खरीदारों में असंतोष बढ़ता जा रहा है। दूसरी ओर बिल्डरों पर बैंक ऋण और निवेशकों का दबाव लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने कहा कि यदि हालात इसी तरह बने रहे तो आने वाले समय में रियल एस्टेट बाजार और अधिक कमजोर हो सकता है। संदीप शुक्ला ने यह भी बताया कि देश के सात बड़े शहरों में किफायती आवासों की बिक्री वर्ष 2025 में लगभग 20 प्रतिशत तक घट गई है। इसका सीधा अर्थ है कि मध्यमवर्गीय परिवार अब घर खरीदने में पहले की तुलना में अधिक कठिनाई महसूस कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोगों की आय उस गति से नहीं बढ़ रही, जिस गति से मकानों की कीमतें और निर्माण लागत बढ़ रही हैं।
परिणामस्वरूप बाजार में मांग कमजोर पड़ रही है और नई परियोजनाओं की शुरुआत भी धीमी होती जा रही है। उन्होंने सरकार से भवन निर्माण क्षेत्र को राहत देने के लिए ठोस कदम उठाने की मांग की। संदीप शुक्ला ने कहा कि यदि निर्माण सामग्री की कीमतों पर नियंत्रण किया जाए, बिल्डरों को सस्ती ब्याज दरों पर ऋण उपलब्ध कराया जाए और रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए विशेष राहत पैकेज घोषित किए जाएं, तो इस क्षेत्र को दोबारा मजबूती मिल सकती है। उन्होंने कहा कि भवन निर्माण क्षेत्र केवल कारोबार नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार का एक बड़ा आधार है। लाखों लोग प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र से जुड़े हुए हैं, इसलिए इसकी स्थिरता देश की आर्थिक मजबूती के लिए बेहद जरूरी है। उन्होंने अंत में कहा कि यदि समय रहते सरकार और संबंधित एजेंसियां इस क्षेत्र की समस्याओं पर गंभीरता से ध्यान नहीं देतीं, तो आने वाले समय में रियल एस्टेट बाजार में मंदी और गहराने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
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