फाल्टा विधानसभा में इस बार रिकॉर्ड 87% वोटिंग हुई थी. यानी लोगों ने इस बार वोट डालने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी. ये भी नहीं कह सकते कि मुस्लिम वोटर घर से नहीं निकले. अब नतीजा भी देख लीजिए. वोटिंग पैटर्न को देखें तो यह मुकाबला कई उम्मीदवारों के बीच था, लेकिन असल बढ़त बीजेपी को तब मिली जब मैदान में मुकाबला पूरी तरह एकतरफा होता दिखाझ बीजेपी ने लगभग हर बूथ पर मजबूत प्रदर्शन किया और बड़े वोट शेयर में तब्दील किया.
किसे कितने वोट मिले
बीजेपी: 149666 वोट (71.2%)
सीपीएम: 40645 वोट (19.34%)
कांग्रेस: 10084 वोट (4.8%)
टीएमसी: 7778 वोट (3.7%)
अन्य/NOTA: बाकी हिस्सा
आप सोच रहे होंगे कि इसमें क्या खास है. लेकिन ठहरिए! असली पेंच यहीं छुपा है. फाल्टा विधानसभा में हिंदू मतदाता करीब 62 से 65% हैं और मुस्लिम मतदाता लगभग 34% से 36% के बीच हैं.
गणित के सामान्य नियम से भी देखें, तो अगर 100% हिंदू बीजेपी को वोट दे देता, जो कि आज तक कभी नहीं हुआ, तब भी बीजेपी का आंकड़ा 62-65% पर आकर थम जाना चाहिए था. लेकिन देवांग्शु पांडा को मिले हैं 71.2% वोट! यानी सीधे-सीधे हिंदू आबादी के कुल अनुपात से भी 10% से 11% ज्यादा वोट.
तो क्या फाल्टा के मुस्लिमों ने भी चुपके से कमल के बटन पर उंगली दबाई? या फिर कांग्रेस और लेफ्ट का वोट बैंक पूरी तरह मटियामेट होकर बीजेपी में समा गया? और सबसे बड़ा सस्पेंस… दीदी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के उम्मीदवार जहांगीर खान को सिर्फ 3.7% वोट क्यों मिले?
खेल हुआ कैसे?
तृणमूल कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार जहांगीर खान ने ऐन वक्त पर मुकाबले से अपना नाम वापस ले लिया था या यूं कहें कि वे चुनावी रेस से तकनीकी या राजनीतिक कारणों से बाहर हो गए. लेकिन चूंकि तब तक बैलट पेपर प्रिंट हो चुके थे और ईवीएम सेट हो चुकी थी, इसलिए उनका नाम और सिंबल ‘दो फूल’ मशीन पर मौजूद रहा. नतीजा? मैदान में न होने के बावजूद जहांगीर खान के नाम पर 7,783 वोट (3.7%) पड़ गए. इसमें दिलचस्प बात ये है कि उन्हें ईवीएम से सिर्फ 6,257 वोट मिले, लेकिन पोस्टल बैलट से 1,526 वोट मिले, जो दिखाता है कि सरकारी कर्मचारियों या ड्यूटी पर तैनात लोगों का एक हिस्सा आंख मूंदकर टीएमसी के नाम पर बटन दबा गया.
दीदी के कैंडिडेट का मैदान से हट जाना ही इस चुनाव का टर्निंग पॉइंट बना. डायमंड हार्बर जैसी हाई-प्रोफाइल लोकसभा सीट के तहत आने वाले फाल्टा में टीएमसी का जमीन पर सक्रिय न होना एक बड़ा वैक्यूम पैदा कर गया. जब सत्ताधारी दल का मुख्य चेहरा ही गायब हो गया, तो टीएमसी का जो कोर वोटर था-विशेषकर मुस्लिम आबादी और सरकारी योजनाओं के लाभार्थी… वे पूरी तरह असमंजस में आ गए.
जहां पुरानी थ्योरी फेल हो गई
फाल्टा विधानसभा मुख्य रूप से एक ग्रामीण इलाका है. इसके सामाजिक ढांचे को समझने के लिए हमें इसके डेमोग्राफी के आंकड़ों को देखना होगा.
- धार्मिक समीकरण: इस निर्वाचन क्षेत्र में हिंदू मतदाताओं की संख्या लगभग 52% से 65% के बीच है. वहीं मुस्लिम मतदाताओं की आबादी काफी निर्णायक है, जो कुल मतदाताओं का लगभग 34% से 36% (कुछ अनुमानों में 38% तक) हिस्सा बनाती है. हासिमनगर, गोपालपुर, फतेहपुर, और भदुरा जैसे क्षेत्र मुस्लिम बहुल माने जाते हैं, जहाँ पारंपरिक रूप से टीएमसी की मजबूत पकड़ रही है.
- जातीय समीकरण (SC फैक्टर): धार्मिक विभाजन के अलावा, यहां की स्थानीय जातियों में अनुसूचित जाति (SC) का बहुत बड़ा प्रभाव है. 2011 की जनगणना और मतदाता सूची के विश्लेषण के अनुसार, फाल्टा विधानसभा में अनुसूचित जाति (SC) के मतदाताओं की संख्या लगभग 25.66% है. स्थानीय ग्रामीण अंचलों और गांवों (जैसे फाल्टा गांव) में कई जगह SC आबादी 80% से भी अधिक है. शेष लगभग 33% से 35% आबादी सामान्य और अन्य पिछड़ी जातियों जैसे कि महिष्य, सद्गोप व अन्य बंगाली हिंदू समुदाय की है.
तो क्या मुस्लिमों ने भी बीजेपी को वोट दिया?
पश्चिम बंगाल में यह राजनीतिक धारणा बहुत मजबूत है कि मुस्लिम समुदाय कभी भी किसी भी परिस्थिति में बीजेपी को वोट नहीं देता. लेकिन फाल्टा में परिस्थितियां बिल्कुल जुदा थीं. जब टीएमसी का उम्मीदवार मैदान में सक्रिय नहीं था, तो मुस्लिम मतदाताओं के सामने सबसे बड़ा संकट यह था कि उनका पारंपरिक ठिकाना गायब था. उनके पास दो ही रास्ते बचे थे या तो वे कांग्रेस के अब्दुर रज्जाक मोल्ला या सीपीआई(एम) के शंभू नाथ कुर्मी की तरफ जाएं, या फिर स्थानीय सत्ता विरोधी लहर का हिस्सा बन जाएं.
आंकड़े बताते हैं कि कांग्रेस को मात्र 10,084 वोट (4.8%) मिले और सीपीआई(एम) को 40,645 वोट (19.34%) मिले. अगर मुस्लिम आबादी ने एकमुश्त लेफ्ट या कांग्रेस को वोट दिया होता, तो इन दोनों पार्टियों का योग बहुत बड़ा होता. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. ग्राउंड रिपोर्ट इशारा करती है कि मुस्लिम बहुल पॉकेट्स (जैसे हासिमनगर और फतेहपुर) के कुछ हिस्सों में, विशेषकर युवा मुस्लिम मतदाताओं ने, रोजगार, स्थानीय विकास और केंद्रीय योजनाओं के प्रभाव में आकर पहली बार ‘कमल’ का बटन दबाया. हालांकि यह कोई सामूहिक बदलाव नहीं था, लेकिन इस ‘साइलेंट शिफ्ट’ ने बीजेपी के वोट शेयर को अप्रत्याशित ऊंचाई पर पहुंचा दिया.
हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण
71.2% के जादुई आंकड़े के पीछे की जो दूसरी और सबसे सटीक थ्योरी है वह है हिंदू वोटों का शत-प्रतिशत कंसॉलिडेशन. जब किसी क्षेत्र में 87% मतदान होता है, तो इसका मतलब है कि सामान्य तौर पर घर पर बैठने वाला या न्यूट्रल रहने वाला वोटर भी पोलिंग बूथ तक पहुंचा है. फाल्टा की सामान्य जातियों (जैसे महिष्य समुदाय) और 25.66% दलित (SC) आबादी के बीच एक जबरदस्त राजनीतिक लामबंदी देखी गई. टीएमसी के स्थानीय नेताओं के खिलाफ जो गुस्सा था, वह इस चुनाव में ज्वालामुखी बनकर फटा. पारंपरिक रूप से जो हिंदू वोटर पहले लेफ्ट फ्रंट (CPIM) को वोट करता था, उसने इस बार अपना वोट खराब न करते हुए सीधे बीजेपी के देवांग्शु पांडा के पक्ष में ट्रांसफर कर दिया ताकि टीएमसी को करारी शिकस्त दी जा सके. यही कारण है कि सीपीआई(एम) का उम्मीदवार मजबूत काडर होने के बावजूद 19.34% पर सिमट गया.
ममता और राहुल के लिए यह शॉकिंग क्यों है?
ममता बनर्जी के लिए बड़ा झटका: डायमंड हार्बर लोकसभा क्षेत्र को टीएमसी का अभेद्य किला माना जाता है. उनके ठीक बगल की विधानसभा सीट फाल्टा पर टीएमसी का इस तरह वॉकओवर दे देना और बीजेपी का 71% से ज्यादा वोट पा जाना यह दिखाता है कि सत्ताधारी दल का जमीनी संगठन अति-आत्मविश्वास या आंतरिक कलह का शिकार है. अगर दीदी का वोटर उनके उम्मीदवार के न होने पर लेफ्ट या कांग्रेस के बजाय सीधे बीजेपी की तरफ देख रहा है, तो यह 2026 के बाद की राजनीति के लिए खतरे का सायरन है.
राहुल गांधी के लिए बड़ा सबक: कांग्रेस ने यहां अब्दुर रज्जाक मोल्ला जैसे पुराने चेहरे को उतारा था, लेकिन जनता ने उन्हें पूरी तरह नकार दिया. राहुल गांधी की ‘न्याय यात्रा’ और बड़े-बड़े दावों के बावजूद, जमीनी स्तर पर कांग्रेस पश्चिम बंगाल में केवल 4.8% वोटों पर सिमट कर रह गई है. अल्पसंख्यक बहुल माने जाने वाले इस क्षेत्र में भी कांग्रेस मुस्लिम मतदाताओं का भरोसा जीतने में नाकाम रही.
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