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कोलकाता. शुभेंदु अधिकारी बतौर सीएम काम बंगाल के लिए कर रहे हैं, लेकिन इसकी गूंज देश भर में सुनाई पड़ रही है. इसकी बड़ी और बुनियादी वजह यह है कि ममता बनर्जी के शासन में ऐसे-ऐसे नियम-कानून राज्य की जनता पर थोप दिए गए थे, जिससे नाखुशी-नापसंदगी के बावजूद कोई विरोध में बोल नहीं पाता था. सत्ता बदलने के साथ ही शुभेंदु ने ममता के फैसलों को पलटना शुरू कर दिया है. शुभेंदु के फैसलों में पूर्ववर्ती सरकार की तुष्टीकरण नीतियां भी हैं, जिससे घुसपैठ को बढ़ावा मिलता था.

योगी की तरह ले रहे हैं फैसले

उत्तर प्रदेश के सीएम बनते ही योगी आदित्यनाथ नाथ ने अपनी पहली प्राथमिकता अपराधियों की नकेल कसने की तय की थी. इसके लिए उन्होंने 4 स्टेप्स तय किए. पहला यह कि बड़े से बड़े सूरमाओं को उनके रसूख के कारण कोई राहत-रियायत नहीं मिले. दूसरा, इन्हें जेल की सीखचों तक पहुंचाने के लिए धर-पकड़ के साथ बुलडोजर की संस्कृति भी उन्होंने शुरू की. तीसरा काम योगी ने यह किया कि एनकाउंटर की रफ्तार बढ़ाई. कई अपराधी मारे गए तो कुछ जख्मी होकर अस्पताल पहुंचे. अपराधियों में इस कदर भय समाया कि उन्हें पेशी के लिए जेल से अदालत जाने में भी एनकाउंटर का खतरा महसूस होने लगा. यह भी सच है कि कई बड़े अपराधकर्मियों का एनकाउंटर जेल से अदालत जाने-आने के दौरान ही हुआ. शुभेंदु ने भी बंगाल में यह प्रयोग प्रारंभ किया है.

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बकरीद में गाय की कुर्बानी रोकी

मुसलमानों में बकरीद के मौके पर पशुओं की कुर्बानी की परंपरा है. बड़े पैमाने पर गोवंश का वध होता है. आजादी के बाद इस पर अंकुश का कानून तो बना, लेकिन चुनावी लाभ के लिए बंगाल की किसी सरकार ने इस पर रोक नहीं लगाई. बंगाल के रास्ते बड़े पैमाने पर गोवंश की तस्करी होती रही है. ममता राज में यह संस्थागत संस्थागत रूप ले चुका था. पशु तस्करी मामले की जांच सीबीआई भी पहले से कर रही है. शुभेंदु ने पुराने कानून को ही झाड़-फूंक कर बाहर निकाला और लागू कर दिया है. गोवंश का वध अब सख्ती से बंगाल में अपराध माना जाएगा. कुर्बानी भी खुले में नहीं होगी. इसे लेकर मुसलमानों में नाराजगी तो है, लेकिन अब उनका मन भी बदलने लगा है. यूपी में भी बकरीद के दौरान गोवंश वध पर बंदिश सख्ती से लागू है.

लाउडस्पीकरों पर कसी नकेल

शुभेंदु अधिकारी ने भी योगी आदित्नाथ की तरह धार्मिक स्थलों पर तेज आवाज में लाउडस्पीकर बजाने पर बंदिश लगा दी है. इतना ही नहीं, सड़कों पर नमाज के लिए भी शुभेंदु ने योगी की तरह रोक लगाई है. योगी तो इस मामले में पहले से ही स्पष्ट रहे हैं. वे साफ कहते हैं कि आबादी कंट्रोल करो या शिफ्ट में नमाज पढ़ो. सड़क पर इसकी छूट कत्तई नहीं. शुभेंदु भी इसी अंदाज में दिख रहे हैं बंगाल में पहले इसके खिलाफ मुसलमानों ने जबरदस्त आवाज उठाई, लेकिन आखिरकार वे बेमन से ही सही, इसके लिए तैयार हो गए हैं. मुसलमानों को केंद्र कर योगी के और भी कई फैसले हैं, जिन्हें शुभेंदु सरकार ने लागू किया है या इसकी तैयारी में हैं.

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घुसपैठियों के खिलाफ एक्शन

शुभेंदु अधिकारी ने एक बड़ा और कड़ा फैसला लिया है. घुसपैठियों को सीधे बीएसएफ के हाथों सौंपने का पुलिस और आरपीएफ को बंगाल सरकार ने निर्देश दिया है. शुभेंदु कहते हैं कि जेल में रख कर करदाताओं का पैसा बर्बाद नहीं करेंगे. सीधे उनके देश वापस भेजा जाएगा. बुलडोजर और एनकाउंटर का सिलसिला तो यूपी-बिहार की तरह सरकार बदलते ही बंगाल में शुरू हो गया है. बंगाल में बड़े पैमाने पर घुसपैठिए हैं, यह बात तो ममता बनर्जी भी कभी कहती थीं. लेकिन, अब तो उनके सुर ही बदल गए हैं. वे नहीं माऩतीं कि बंगाल में कोई घुसपैठिया है.

मुसलमानों का मिल रहा साथ!

सड़क पर नमाज पढ़ने की मनाही, गायों की कुर्बानी पर रोक, बकरीद की छुट्टी में कटौती जैसे शुभेंदु अधिकारी के फैसलों से शुरू में मुसलमानों की नाराजगी तो रही, लेकिन आहिस्ता-आहिस्ता अब उनका मन बदलने लगा है. हालांकि उनसे अधिक ममता बनर्जी को शुभेंदु के फैसलों पर आपत्ति है. अब तो उन्होंने सड़क पर नमाज पढ़ने के लिए सुप्रीम कोर्ट जाने का फैसला कर लिया है. गायों की बलि के संबंध में कोलकाता की ऐतिहासिक नाखुदा मस्जिद के इमाम की अपील से साफ हो गया है कि बंगाल के मुसलमान टकराव के मूड में नहीं हैं. वे सरकार के फैसले को कबूल करते हैं. हालांकि आम जनता उन्नयन पार्टी के चीफ हुमांयू कबीर जैसे कुछ लोग हो सकते हैं, जिन्हें सरकार का यह फैसला स्वीकार नहीं है.

योगी-शुभेंदु एक राह के राही

शुभेंदु अधिकारी और योगी आदित्यनाथ को कड़े फैसले लेने में इसलिए आसानी है कि दोनों बहुमत वाली सरकार चला रहे हैं. दोनों के काम-धाम एक जैसे दिख रहे हैं. यूपी के मुसलमान भाजपा से भले नफरत करें, लेकिन योगी के वे ज्यादा करीब होते दिख रहे हैं. अतीक अंसारी और आजम खां जैसे कई बड़े मुस्लिम नेताओं के साथ योगी सरकार ने सख्ती की. मुसलमानों का मुखर विरोध नहीं दिखा. इसकी वजह योगी शासन की सख्ती तो रही है, लेकिन बड़ा कारण यह रहा है कि योगी सरकार ने अपराध के मुद्दे पर कोई भेदभाव नहीं किया. सिर्फ मुसलमान अपराधियों का ही एनकाउंटर नहीं हुआ, बल्कि राजपूत-ब्राह्मण जाति के अपराधी भी एनकाउंटर में मारे गए. बंगाल की शुभेंदु सरकार और योगी के एक जैसे फैसलों और एक्शन में समानता से दोनों के बीच एक अघोषित-अचर्चित बांडिंग दिख रही है. इसका फायदा 2027 के यूपी चुनाव में योगी आदित्यनाथ को मिल सकता है. इनके फैसलों में हिन्दू वोटों के ध्रुवीकरण का संदेश साफ दिख रहा है. भाजपा की ताकत भी यही रही है.

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